माँ कूष्मांडा — सृष्टि की जननी, ब्रह्मांड की शक्ति

एक शक्ति जो भगवान से भी पुरानी है…
सोचिए एक पल के लिए — जब कुछ भी नहीं था। न धरती, न आसमान, न सूरज, न चाँद, न हवा, कुछ नहीं। बस घुप्प अंधेरा। ऐसे में भी एक चीज़ थी। एक दिव्य ऊर्जा। जो उस अंधेरे में भी रोशन थी। वही हैं माँ कूष्मांडा।माँ कूष्मांडा के बारे में जब पहली बार पढ़ा था, तो मन में एक अजीब-सी हलचल हुई। ऐसा क्यों होता है जब हम किसी ऐसी शक्ति के बारे में पढ़ते हैं जो खुद ब्रह्मांड से पुरानी हो? शायद इसलिए क्योंकि हम उस शक्ति का एक हिस्सा हैं और हमारा मन उसे पहचानता है।नवरात्रि का चौथा दिन माँ कूष्मांडा का होता है। लेकिन यह सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं है भाई। यह उस सृजन शक्ति को याद करने का दिन है जिसने इस पूरे जगत को एक मुस्कान से रच दिया। हाँ, एक मुस्कान से।
नाम का रहस्य: कूष्मांडा का अर्थ
नाम में क्या रखा है? बहुत कुछ रखा है। ‘कूष्मांडा’ नाम तीन शब्दों से मिलकर बनता है:
- कू: छोटा
- उष्म: ऊर्जा या गर्मी
- अंडा: ब्रह्मांडीय अंडा
मतलब जिन्होंने अपनी दिव्य शक्ति से इस ब्रह्मांड को जन्म दिया, वही माँ कूष्मांडा हैं।
एक दूसरी मान्यता यह भी है कि संस्कृत में ‘कूष्मांड’ का मतलब होता है कुम्हड़ा (कद्दू)। माँ को कुम्हड़े की बलि बहुत प्रिय है, इसीलिए भी यह नाम पड़ा। लेकिन मेरे मन में जो बात सबसे ज़्यादा ठहरती है वो यह है कि माँ ने शून्य में से सृष्टि रची। जब कुछ भी नहीं था — उस वक्त माँ ने मुस्कुराया और सब कुछ हो गया। यह सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। आखिर कितनी बड़ी शक्ति रही होगी उस एक पल में।
माँ का दिव्य स्वरूप
माँ कूष्मांडा आठ भुजाओं वाली देवी हैं, इसीलिए इन्हें अष्टभुजा देवी भी कहते हैं।
- वाहन: शेर (जो शक्ति और साहस का प्रतीक है)
- निवास: माँ सूर्यलोक में रहती हैं और उनका तेज खुद सूर्य जितना चमकीला है।
- अस्त्र-शस्त्र: उनके आठ हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल, अमृत कलश, चक्र, गदा और जपमाला रहती है।
जब यह कल्पना करता हूँ कि सूर्य के उस चमकते गोले में माँ विराजमान हैं — तो मन अपने आप झुक जाता है। उनकी आठ भुजाएँ हर दिशा से हमारी रक्षा करती हैं।

सृष्टि का जन्म कैसे हुआ?
यह सवाल हर इंसान के मन में आता है। विज्ञान कहता है ‘बिग बैंग’ से। हमारे शास्त्र कहते हैं माँ कूष्मांडा की हँसी से।
जब न धरती थी, न जल, न वायु, न अग्नि — तब माँ ने अपनी दिव्य हँसी से इस ब्रह्मांड को रचा। एक ऊर्जा का विस्फोट हुआ और सब कुछ अस्तित्व में आ गया। इसीलिए उन्हें आदिशक्ति कहते हैं, क्योंकि वे सृष्टि से पहले की शक्ति हैं। जिस तरह एक माँ की मुस्कान उसके बच्चे के लिए सबसे बड़ी ताकत होती है, उसी तरह माँ कूष्मांडा की मुस्कान पूरे ब्रह्मांड के लिए जीवन का स्रोत बनी।
माँ और सूर्य का रिश्ता
माँ कूष्मांडा सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं। यानी सूर्य की जो ऊर्जा है वो उन्हीं से आती है।
- सुबह की पहली किरण में माँ की ऊर्जा होती है।
- खेत में पकता अनाज, खिलते फूल और बहती नदी — सब कुछ उसी ऊर्जा से चल रहा है जो माँ ने इस सृष्टि में भरी है।
इसीलिए माँ की उपासना से भक्त को ऊर्जा मिलती है, रोग दूर होते हैं, आयु और यश बढ़ता है, बुद्धि तेज होती है और मन में शांति आती है।
नवरात्रि का चौथा दिन — खास क्यों है?
नवरात्रि के पहले तीन दिन (माँ शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा) मन धीरे-धीरे तैयार होता है। चौथे दिन जब हम माँ कूष्मांडा के सामने होते हैं तो एक अलग ही अनुभव होता है — जैसे उस मूल ऊर्जा के पास पहुँच गए हों जहाँ से यह सब शुरू हुआ था। मंदिरों की भीड़, भजनों की गूँज, धूप और घी की सुगंध — सब मिलकर एक अवर्णनीय माहौल बनाते हैं।
पूजा विधि और खास बातें
- वस्त्र: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और लाल या नारंगी वस्त्र पहनें (माँ को ये रंग प्रिय हैं)।
- भोग और प्रसाद: माँ को कुम्हड़े की बलि और मालपुए का भोग बहुत पसंद है। सूजी का हलवा भी चढ़ाया जा सकता है।
- पुष्प: गेंदे के पीले फूल अर्पित करना शुभ माना जाता है।
- समय: चूँकि माँ सूर्यमंडल में रहती हैं, इसलिए सूर्योदय से पहले या उसके समय पूजा करना ज़्यादा फलदायी माना जाता है। घी का दीपक और अगरबत्ती जलाकर माँ का ध्यान करें।

मंत्र जो मन को शांत कर देते हैं
माँ के मंत्र पढ़ते वक्त एक अजीब सी शांति आती है। सूर्योदय के समय इन मंत्रों का जाप विशेष लाभकारी होता है:
बीज मंत्र:
ॐ कूष्मांडायै नमः
ध्यान मंत्र:
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्मांडा शुभदास्तु मे।।
स्तुति:
या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्मांडा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
अनाहत चक्र और ज्योतिषीय महत्व
योग और तंत्र में: माँ कूष्मांडा का संबंध अनाहत (हृदय) चक्र से है। यहाँ से प्रेम, करुणा और आनंद की ऊर्जा बहती है। जब यह चक्र जागता है तो इंसान में प्रेम और उदारता आती है।
ज्योतिष में: जिनकी कुंडली में सूर्य कमज़ोर हो, उन्हें माँ कूष्मांडा की विशेष उपासना करनी चाहिए। कमज़ोर सूर्य से आत्मविश्वास की कमी, नेतृत्व (Leadership) में परेशानी, सरकारी कामों में अड़चन और पिता से रिश्तों में तकलीफ हो सकती है। माँ की उपासना से ये सब परेशानियां दूर होती हैं।
प्रसिद्ध मंदिर जहाँ मिलती है असीम शांति
इन मंदिरों के दर्शन का अनुभव शब्दों में बताना मुश्किल है:
- कानपुर (उत्तर प्रदेश): यहाँ माँ कूष्मांडा का एक बहुत प्रसिद्ध मंदिर है।
- चित्रकूट: एक अत्यंत प्राचीन मंदिर जहाँ मान्यता है कि माँ की कृपा जल्दी मिलती है।
- विंध्याचल: यहाँ माँ को विंध्यवासिनी के रूप में पूजा जाता है (51 शक्तिपीठों में से एक)।
- वाराणसी: यहाँ की गलियों में माँ की स्वयंभू प्रतिमा विराजमान है।
माँ से हम क्या सीखते हैं?
- मुस्कुराते रहें: माँ ने पूरा ब्रह्मांड मुस्कुराकर बनाया। तो जब ज़िंदगी में मुश्किलें आएँ, मुस्कान मत छोड़ो।
- शक्ति और करुणा का संतुलन: शक्तिशाली होना और दयालु होना साथ-साथ चल सकता है। माँ सूर्य जितनी शक्तिशाली और एक माँ जितनी करुणामय हैं।
- सृजन करते रहें (Keep Creating): माँ ने सृष्टि बनाई, हम भी कुछ बनाते रहें — चाहे लिखना हो, बनाना हो, या किसी के चेहरे पर मुस्कान लाना हो।
बचपन की एक याद और माँ की प्रासंगिकता
नवरात्रि का चौथा दिन याद करता हूँ तो बचपन की एक तस्वीर आँखों में आ जाती है। घर में घी और मालपुए की खुशबू, दीपक की रोशनी और मंत्रों की आवाज़। उस वक्त एक चैन और हिफ़ाज़त का एहसास होता था। आज की तनाव भरी ज़िंदगी (नौकरी, रिश्ते, पैसे का तनाव) में जब हम आँखें बंद करके माँ का ध्यान करते हैं, तो वही बचपन वाला सुकून मिलता है। कोई चिंता नहीं, कोई भय नहीं।
माँ ने यह ब्रह्मांड बनाया — और हम उस ब्रह्मांड का हिस्सा हैं। हमारे अंदर भी वही शक्ति है। बस पहचाननी है।
जय माँ कूष्मांडा!
या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्मांडा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
